
*जिन मन्दिर पाठशाला है तो घर प्रयोगशाला है–मुनि विशोधसागर जी*
खण्डवा//
संसार मे आचरण पूजनीय होता है।नाम,सूरत,और तस्वीर आदि तो सब बदलते रहते है लेकिन व्यक्ति का आचरण और चारित्र अनुकरणीय बनकर पूज्यता को प्राप्त होता है।दिगम्बर मुनिराज चारित्र की खान होते हैं।जिस तरह पूत के पांव पालने में नजर आते हैं उसी तरह परमात्मा के पांव मुनियों के आचरण में झलकते हैं।जब भी नगर में या जिनालय में मुनिराज का समागम मिले, हमे उनके चरणों मे बैठ जाना चाहिये।क्योंकि ये मुनिराज ही भविष्य के भगवान होकर पंच परमेष्ठी की श्रेणी में विराजमान होते हैं।हमारे देव,शास्त्र,गुरु,जिनधर्म,जिनालय और जिनागम एक पाठशाला है और हमारा गृहस्थ जीवन धर्म व संतो की वाणी को आत्मसात करने की प्रयोगशाला है।
घासपुरा स्थित श्री सरावगी जैन मंदिर में आयोजित प्रवचनमाला में मुनि श्री विशोधसागर जी ने उक्त बात कही।उन्होंने कहा कि आजकल सुविधाये शिथिलता का कारण बन गयी है।तीर्थ यात्रा या भगवान के दर्शन आदि क्रियाओं में हम सबसे पहले व्यवस्थाएं देखते हैं।जिसके कारण हमारा मन जिन दर्शन में कम व्यवस्थाओं की पूर्ती में ज्यादा लगता है।इसलिये हमे व्यवस्था नहीं अपने आपको व्यवस्थित करने की जरूरत है। मोबाइल और टीवी आज संस्कार और चारित्र पतन के सबसे बड़े कारक सिद्ध हो रहे हैं।सिनेमा और सीरियल के कारण हम संस्कार भूल रहे है वहीं रील के कारण शील को भ्र्ष्ट किया जा रहा है।बाहरी आकर्षण चारित्र मोहनीय कर्म का बंध करा रहा है।योगियों और तपस्वियों को कष्ट और दुख उपसर्ग नही उपकार के समान लगते हैं।दुखों को सहन करे बिना सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।
मुनि सेवा समिति के प्रचार मंत्री सुनील जैन एवं प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि रविवार को आहारदान का अवसर संगीता पवन एवम अर्पिता सुदीप रावका परिवार को मिला। मंगलाचरण सुनीता पाटनी ने किया।मुनि श्री के मंगल प्रवचन प्रातः 8:30 बजे से घासपुरा स्थित महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में हो रहे हैं।दोपहर 3 बजे से ज्ञानार्णव ग्रन्थ पर स्वाध्याय एवम शाम को 6:30 बजे से गुरु भक्ति एवम आरती की जा रही है।आचार्य विद्यासागर जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन विजय सेठी एवम प्रकाशचन्द जी जैन ने किया।संचालन अविनाश जैन ने किया।









